हरयाणा में बेटियों की सुरक्षा
पर रिपोर्ट
प्रस्तुतकर्ता
शुभम वर्मा
क्रम – सूची
· प्रस्तावना
· सामाजिक ढांचा
· नारी सशक्तिकरण
· आधुनिकरण तथा महिला
सशक्तिकरण की शिकार महिलाएं तथा समाज
· योजनायें तथा उनके
परिणाम
· हल या निवारण
· योजनायें जो लागू की
जा सकती हैं
· कार्यान्वित करने का
तरीका
प्रस्तावना :-
बेटी बचाओ के ऊपर सुझाव लिखने से पहले मै यह
बताना चाहता हूँ के इसे बनाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी , वह भी हरयाणा के
परिपेक्ष्य में हम जानते हैं | कुछ आंकड़े में प्रस्तुत करना चाहता हूँ जिनके आधार
पर हमें यह जानकारी हो जायेगी की हरयाणा में बेटियां या महिलायें किन हालातो में
हैं |
1. २०११ की जनगणना के
आधार पर यह पाया गया की हरयाणा में 1000 पुरुषों पर 879 महिलाएं हैं जबकि भारत में यह आंकड़ा 940 है |
2. २०११ के ही आंकड़ो के
अनुसार साक्षरता के मामले में पुरुषों की साक्षरता है 84.06 % जबकि महिलाओं की 65.94 % |
3. नेशनल क्राइम
रिपोर्ट ब्यूरो की २०१३ की रिपोर्ट के अनुसार हरयाणा में बलात्कार के 971 मामले दर्ज किये गए
|
इन आंकड़ो और कई और बातों को मद्देनजर रखते हुए
हरयाणा में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए यह रिपोर्ट तैयार की गयी है |
इसमें मैंने कोशिश की है के महिलाओं की स्थिति जरुर सुधरे पर पुरुषों के साथ भी
अन्याय ना हो तथा हरयाणा के समाज तथा संस्कृति को भी ठेस ना पहुचे |
सामाजिक ढांचा :-
हरयाणा में कई सालों से एक सामाजिक तथा
सांस्कृतिक ढांचा रहा है जिसमे मुख्यतः समाज खेती पर आधारित रहा है तथा आज भी कई
गाँव में आज भी समाज खेती पर ही निर्भर है | पहले और आज भी महिलाऐं तथा पुरुष
मिलकर खेती किया करते थे तथा महिलाओं का सभी लोग सम्मान किया करते थे | पर भारत की
गुलामी के दौर में कई लोग जिन्होंने भारत को गुलाम बनाया उन्होंने महिलाओं पर बुरी
नजर डालनी शुरू की | वहाँ से पर्दा प्रथा प्रारंभ हुई तथा भारत इतने अधिक साल
गुलाम रहा के यह पर्दा प्रथा सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गयी | पर गुलामी के दौर
में औरतों को उठा लेना तथा बलात्कार आम बात हो गए थे इस कारण समाज के पुरुषों ने
तय किया के बाहर जाकर हम काम करेंगे तथा परिवार समाज को एक रखना तथा घर के अन्दर
की जिम्मेदारियां महिलाएं संभालेंगी ताकि बाहर वो किसी अंग्रेज या उनका साथ देने
वाले दबंगों की नजर में ना आयें | अब यह प्रथा भी इतने अधिक दिनों तक जारी रही के समाज
का हिस्सा ही बन गयी पर लोगों ने इसके बाद भी महिलाओं की इज्जत करना तथा उनको हर
काम में भागीदार बनाना नहीं छोड़ा इसके कई उदाहरण आज भी हरयाणा के गाँव में देखे जा
सकते हैं | जहाँ आज भी पुरुष महिलाओं की राय लेते हैं तथा मिलकर कार्य करते हैं |
पर ऐसा नहीं है सब कुछ अच्छा ही रहा है | जब भारत गुलाम था तब अंग्रेजो ने हमें
तोड़ने जातिवाद का जहर बो दिया था जिसके तहत कई जातियां आपस में एक दुसरे से नफरत
करने लगी थीं तथा आजाद होने के बाद भी कुछ लोग औरतों के प्रति वही नजरिया रखने लगे
जैसा की हमें गुलाम बनाने वाले रखा करते थे | इसके कारण बलात्कार आदि की घटनाएँ
होने लगी | तब ग्रामीण समाज ने फैसला लिया के गाँव में सभी भाई बहन होंगे तथा एक
गोत्र में शादी नहीं होगी तथा वह भी भाई बहन होंगे | इस फैसले के कारण पूरा समाज
वापस सही होने लगा तथा गाँव की बेटी पुरे गाँव की बेटी या बहन होती थी तो कोई उसपर
बुरी नजर से नहीं देखता था | तथा कभी कोई कुछ गलत करने का प्रयास करे तो उसे
पंचायत से दंड भुगतना पड़ता था तथा सामाजिक बहिष्कार हो जाता था | पर इसके बाद देश
ने तरक्की करना शुरू किया तथा पुरानी मान्यताओं को पिछड़ा तथा दकियानूसी माना जाने
लगा और फिर तभी विदेश से फेमिनिस्म तथा नारी सशक्तिकरण के नाम पर कई संस्थाएं आकर
खड़ी हो गयीं |
नारी सशक्तिकरण :-
जब यह शब्द अमेरिका से आया तो सभी को लगा के इससे
महिलाओं का भला होगा पर इन्होने बिना भारत की समस्याओं का अध्ययन किये हुए भारत पर
भी उसी तरह का सशक्तिकरण थोपने का प्रयास किया जैसा अमेरिकी समाज में था जिसमे की
लडकियों का सिगरेट, शराब पीना या छोटे कपडे पहनना या फिर लडको जैसे काम करना
सशक्तिकरण समझा जाता था | यह वही अमेरिकी समाज था जहाँ औरतो को १९५० तक न तो
वोटिंग का अधिकार था ना ही बैंक में अकाउंट खुलाने का , वहाँ आज तक कोई महिला
राष्ट्रपति नहीं बनी | वह लोग उनके एन.जी.ओ खोलकर हमें सिखा रहे थे के किस तरह से
भारत में महिलाओं को हक़ दिलाएं जाएँ | पर असल में यह उनकी कंपनियों जैसे सिगरेट या
ब्रांडेड कपडे या ब्रांडेड मेकअप का सामान आदि इन सबकी चाल थी के भारत की महिलाओं
को सशक्तिकरण के नाम पर यह सब सामान बेचा जाए तथा उसी दौर में लगातार भारत की मिस
वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स जीती थी तथा बॉलीवुड और विज्ञापन भी विदेशी सामान और उनकी तरह
दिखने वालों को रोल मॉडल बना रहा था | इन सबकी चका चौंध में आ गयी छोटी छोटी
बच्चियां जिन्हें लगा यही तरीका सही है तथा हमारे यहाँ जो है वो गलत है | उन्होंने
यहाँ यह सामान खरीदना तथा प्रयोग करना शुरू कर दिया पर अभी भी गाँव में महिलाओं को
इसकी आदत या लत नहीं थी तो कंपनियों ने वहाँ तक इन सब वस्तुओं को पहुचाने के लिए
महिला सशक्तिकरण के एन.जी.ओ तथा संस्थाओं को पैसा दिया ताकि यह सब जगह जाकर
महिलाओं को यह बताएं के तुम्हे साडी सलवार सूट तथा अन्य भारतीय कपडे पहना कर दबाया
जा रहा है | तुम्हे मेकअप ना करने देकर तुम पर अत्याचार हो रहा है | कुछ ऐसे केस
जिनमे महिलाओं को पति मारते थे उनके फोटो लेकर यह बताया जाने लगा के सारे हरयाणा
में यही होता हे | यह सब इतनी बार बोला गया के बच्चियां तथा महिलाएं पुरुषों से नफरत
करने लगें | यहाँ तक के कई पुरुष भी यह कहने लगे के हरयाणा के हर घर में यह होता हे | और इससे बचने
के लिए वही जीन्स टी शर्ट , मिनी स्कर्ट तथा मेकअप इत्यादि के सुझाव दिए गए दिल्ली
पास होने के कारण यहाँ कुछ उदारवादी शिक्षण संस्थाओं में लडकियों को खुलापन , शराब
सिगरेट आदि पिलाए जाने लगे तथा किस डे , लव डे इत्यादि इस तर्ज पर मनाये जाने लगे
के भारतीय संस्कृति ख़राब है तथा हम उसे ठीक कर रहे हैं | इस तरह के महिला
आन्दोलनों से उल्टा असर हुआ लड़कियां जो गाँव से शहर पड़ने आई वो वापस जाकर माता
पिता की सोच से नफरत करने लगीं कई ने लव मेरिज कर ली तथा गाँव और माता पिता दोनों
को छोड़ दिया | अब दिक्कत यह थी के महिला सशक्तिकरण सिर्फ बड़े कालेजो में अंग्रेजी
में पड़ी लिखी लडकियों के लिए ही था गाँव की महिला या छोटे शहर की लड़की या अपनी
मर्जी से भारतीय तरीके से रहना चाहती है उन सबके लिए इसमें कोई जगह नहीं थी |
इसलिए सारा समाज इस शिक्षा के खिलाफ हो गया तथा कई लडकियों को कॉलेज पड़ने जाने से
रोक दिया गया |
आधुनिकरण तथा महिला
सशक्तिकरण की शिकार महिलाएं तथा समाज :-
जिस तरह 1990 में वैश्वीकरण हुआ उसी समय सभी तरह
का बाजार भारत के लिए खुल गया तथा आधुनिक कपडे , मेकअप, बाइक्स, गाड़ियाँ , जुटे
इत्यादि युवाओं की पहली पसंद बन गए | जो समाज पहले पुरानी चीजो को दोबारा प्रयोग
करने की सोच रखता था तथा बड़े भाई बहनों की किताबे , कपडे आदि सामान छोटे प्रयोग कर
लेते थे वो समाज अब खर्चा करना सीख गया क्योंकि टीवी अख़बार और सिनेमा में उसे यही
घुट्टी पिलाई जा रही थी | इसी की चपेट में फंस कर युवा नशा तथा पोर्न और सेक्स के
जाल में फंसते चले गए | फिल्मो के हीरो असली जिंदगी में सबके नायक बन गए तथा सभी
युवा उनकी नक़ल करके प्यार और मोहब्बत आदि करना फैशन समझने लगे | इससे हरयाणा के
गाँव में भी भाई बहन वाला माहौल बचा नहीं रह गया | अब एक गाँव में भी प्रेम प्रसंग
होने लगे तथा एक गोत्र में भी | कई लोग छुप कर यह काम करने लगे | कई बार समझाने
तथा सजा तक मिलने के बाद भी युवा यह सब करते रहे | इसका असर गाँव के और बच्चों पर
भी पड़ने लगा तथा वह भी उनकी नक़ल करने लगे | इससे परेशान होकर कुछ जगह पर पंचायतो
ने इस तरह के गलत फैसले लिए जिसमे युवा जोड़ों की जान तक ले ली गयी | पर क्या इससे
समाज सुधरने वाला था बिलकुल भी नहीं इससे और बल मिल गया विदेशी चंदे से चलने वाले
एन.जी.ओ तथा संस्थाओं को के यह खाप पंचायत वाले हत्यारे होते हैं तथा महिला और
प्रेम विरोधी हैं | जबकि उन हत्यारे लोगों को कोर्ट सजा सुना चूका था पर मीडिया ने
इसे इस तरह प्रचारित किया के हरयाणा की हर पंचायत पुरुषों के कब्जे में है तथा सभी
गलत हैं और इन पंचायतो को बंद करवा देना चाहिए | इस पर समाज और पंचायत ने और कड़ा
रुख अपना लिया तथा बच्चियों की शिक्षा कई जगह रोक दी गयी | उनके तथाकथित आधुनिक
कपडे पहनने पर रोक लगा दी गयी तथा शहर पढने भेजने में लोग डरने लगे तो जल्दी
शादियाँ होने लगी | अब इसका लडकियों तथा महिलाओं ने विरोध शुरू कर दिया जिसमे
एन.जी.ओ तथा शहरी ह्यूमन राईट वाले तथाकथित लोगो ने और आग में घी डालने का काम
किया | इसका नतीजा यह निकला के नफरत इस कदर बड गयी के लोगों ने लडकियों को पैदा
करना ही बंद कर दिया | इसका मतलब भ्रूण हत्या की जाने लगी | कई पड़े लिखे लोगों को
भी यह लगने लगा इन्हें पैदा करेंगे फिर यह भाग जाएँगी या बड़ी होकर हमसे ही बगावत
करेंगी ( जबकि यह पूरी तरह से सही नहीं है ) इस कारण से भ्रूण हत्या और बढ़ने लगीं
तथा आज की हालत यह है की १००० पर ८७९ लड़कियां बची हैं तथा हरयाणा में शादी के लिए
लडको को केरला आदि से लड़कियां खरीद कर लानी पढ़ती हैं |
योजनायें तथा उनके
परिणाम :-
अब तक सरकार जो योजनायें लायी है निश्चित रूप से
वो अच्छी हैं | मगर कई योजनाओं में अधिकतर बनाने वाले वही एनजीओ हैं या उसी शिक्षा
में पढ़े लोग हैं जिन्हें महिला सशक्तिकरण के रटे रटाये तरीके पता हैं तथा वो पहले
से यह मान कर चलते हैं के यह समस्याएं हैं और इनके हल हमें देने हैं | कुछ लोग जो
रिसर्च करते हैं वो भी सैंपल रेट इतना कम रखते हैं के दो तीन गाँव की समस्याओं को
पुरे हरयाणा की बताकर एक ग्लोबल हल देने का प्रयास करते हैं | पर भारत में अमेरिका
की तरह सब एक जैसा नहीं है | इसलिए योजनायें कम सफल हो पाती हैं | यहाँ हर राज्य
अलग है , उसी तरह हर जिले की समस्या अलग अलग हैं | यहाँ तक की हर गाँव की समस्या
भी अलग अलग हैं | हमें सबका एक जैसा हल ना देते हुए पहले कुछ समितियां बनानी चाहिए
जिसमे हर जाती धर्म तथा वर्क के पुरुष महिला हों जिनमे पढ़े लिखे तथा अशिक्षित
दोनों तरह के लोग हों | इन्हें हर गाँव की समस्याओं को लिख कर या बताकर हम तक या
जिला समिति तक पहुचाना चाहिए फिर वहाँ से यह राज्य तक आयें | फिर हर जिले के हिसाब
से इनके हल निकाले जाएँ तो काफी कुछ समस्याएं हल हो सकती हैं |
हल या निवारण :-
इसका हल या निवारण दो तरीको से या दो स्तर पर ही
संभव है | पहला ऐसी योजनायें जिनसे लडकियों को आगे बढ़ने के बराबर मौके मिले तथा
प्रोत्साहन मिले | दूसरा और सबसे जरुरी काम है लोगों की मानसिकता बदलना और यह सबसे
महत्वपूर्ण काम है क्योंकि इसके बिना कोई योजना सफल नहीं हो सकती | तथा इस स्तर पर
कोई नहीं सोचता | पर भारत नीतियों से नहीं धर्म से चलता है | यहाँ गाँव के लोग
संविधान से ज्यादा धर्म की बातो को महत्त्व देते हैं | अतः हमें धर्म को निति में
जोड़कर कुछ हल निकालना चाहिए | जिसमे श्री श्री रविशंकर , रामदेव बाबा , गायत्री
परिवार इत्यादि के प्रवचन तथा नुक्कड़ नाटक और कथाएं बड़ी काम में आएँगी जिनमे धर्म
का नाम लेकर महिलाओं की चर्चा की जाए जैसे सीता या अनसुइया आदि | इसके अलावा बच्चो
की संस्कार शाला हर गाँव में खोली जाए जिसमे बचपन से ही उन्हें संस्कार इस तरह के
दिए जाएँ के अगली पीड़ी के मन में भेदभाव ना हो तथा बचपन के संस्कार इतने मजबूत हों
के कोई कॉलेज इन्हें अपने समाज से अलग ना कर पाए तथा यह शिक्षित और संस्कारवान दोनों
बन सकें | बस ध्यान यह रखना है के संस्कार शालाओं का सिलेबस बहुत सोच समझ कर बनाया जाए तथा उसमे आधुनिक
चीजे भी उतनी ही डाली जाएँ जितनी संस्कार की बातें | बच्चो के नशे के नुकसान के
विषय में , पर्यावरण के विषय में , महिलाओं के सम्मान के विषय में तथा भारत के
गौरवमयी इतिहास के विषय में पढाया जाए | साथ ही साथ इन संस्कार शालाओं के शिक्षको
की विशेष ट्रेनिंग हो वरना यह कुछ सुधार नहीं पायेंगे | तथा महीने में एक बार सभी
संस्कार शालाओं से कुछ समाज सेवा का कार्य करवाया जाए जैसे नदी साफ़ करना , गाँव
साफ़ करना , माँ की खाना बनाने या घर साफ़ करने में मदद करना , पेड़ लगाना आदि | यहीं
पर कुछ डाक्यूमेंट्री या फिल्म बच्चो को दिखाकर उनके बीच चर्चा की जाय जिसमे
महिलाओं का सम्मान करना तथा उनके साथ क्या दिक्कते आती हैं तथा इन्हें कैसे दूर
किया जा सकता है इन सब पहलुओं पर बात हो | यह धीमा रास्ता है पर सोच बदलने में यही
काम आएगा | क्योंकि टीवी और सिनेमा को भी इतने ही साल लगे दिमाग बदलने में | यह
सारा काम इस तर्क पर आधारित है के जब एक
छोटे से बच्चे ने बचपन में रजा हरिश्चंद्र का नाटक देखा और उससे इतना प्रभावित हो
गया के जिंदगी भर उसने वैसा बनने का प्रयास किया वो बच्चा था महात्मा गाँधी , तो
आजकल के बच्चे जो दिनभर में फिल्मो और नाटको में रोज ४-५ बलात्कार तथा ७०-८०
अश्लील या गंदे दृश्य देखते हैं , हम उनसे क्या उम्मीद रख सकते हैं | गलती हमारी
हे हम उन्हें गलत चीजे तो टीवी और इन्टरनेट में परोस रहे हैं मगर अच्छी बाते तथा
संस्कार कही कोई नही सिखा रहा | विद्यालय भी उन्हें बस पैसा कमाना सिखाते हे
नैतिकता नही , इसलिए आवश्यकता हे संस्कार शालाओं की |
योजनायें जो लागू की
जा सकती हैं :-
अब बात करते हैं योजनाओं की जो लायी जा सकती हैं
तो इनमे :-
1. गाँव में कई
लड्कियें स्कूल इसलिए छोडती हैं क्योंकि वहाँ उचित कमरे तथा बाथरूम नहीं होते जहाँ
लड्कियें सुरक्षित महसूस करें तथा समस्या आने पर उस जगह जा सकें | तो इस तरह के कमरे
तथा हर स्कुल में बाथरूम ( शौचालय ) आदि की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए इसमें
सरकार CSR के द्वारा कंपनियों से पैसा ले सकती है | तथा लडकियों के लिए बने कमरों
में किसी महिला शिक्षिका को चार्ज सौपना चाहिए ताकि वो उचित तरह से उन्हें संभाल
सके |
2. सुरक्षा के लिए
महिला पुलिस को लडकियों से दोस्ती करनी चाहिए | बचपन से ही स्कुल और कॉलेज में महिला
पुलिस के सेमिनार होने चाहिए तथा उन्हें लडकियों के साथ नंबर शेयर करने चाहिए |
महिला पुलिस के साथ एक मनोवैज्ञानिक भी रहना चाहिए जो लडकियों से बात करके उनकी
समस्याएं जान सके और बच्चियां जरुरत पड़ने पर बिना डरे कंप्लेंट लिखा सकें |
3. प्रदेश की महिलाओं
तथा बच्चियों को जिन्होंने किसी भी क्षेत्र में जैसे खेल , पढाई , कला , विज्ञान आदि में अच्छा किया हो
उन्हें सरकार को खुले आम पुरस्कृत करना चाहिए तथा प्रदेश भर में उनको प्रमोट करना
चाहिए जैसे साइना नेहवाल आदि | इससे माता पिता में विश्वास जागेगा के हमारी बेटी
भी ऐसा कर सकती है |
4. उन माँ बाप की जिनकी
सिर्फ एक या दो बेटियां हैं और कोई बेटा नहीं है, उनकी सरकार को बच्चियों की पढाई
में आर्थिक मदद करनी चाहिए चाहे वो किसी भी जाती के हो |
5. वो महिलाएं
जिन्होंने गाँव में रहकर खेती या अपना कोई व्यापार जैसे कड़ाई बुनाई या कंप्यूटर
सेण्टर , या पापड़ आदि खाद्य सामग्री का काम किया हो तथा उसमे सफल रही हों उन्हें
भी सरकार को सम्मानित करना चाहिए भले ही वो अशिक्षित हों | तथा इसी तरह शिक्षित
महिलाएं भी जो बिज़नस में सफल हैं उन्हें भी रोल मॉडल की तरह प्रस्तुत करना चाहिए |
6. गाँव की दलित और
गरीब बच्चियों को जो दसवी के आगे पड़ने जाएँ उन्हें साइकिल सरकार की तरफ से देनी
चाहिए क्योंकि कई बार गाँव में स्कुल दूर होता है |
7. जो बच्ची किसी भी
खेल में नेशनल गोल्ड दो बार तक ले आये उसकी पढाई और खेल से सम्बंधित खर्चा सरकार को उठाना चाहिए जब तक
वो अपने पैरों पे खड़ी ना हो जाये और बड़े खिलाडियों से जैसे विजेंदर सिंह , साइना
नेहवाल , अभिनव बिंद्रा से इसके लिए फण्ड तथा मोटिवेशन और ट्रेनिंग में मदद ली जा
सकती है |
8. गरीब और दलित परिवार
की बेटियों की सरकार को सम्मलेन में शादी अपने खर्च से करवानी चाहिए जिसमे एक दहेज़
की किट बनायी जाए जिसमे बर्तन और कुछ उपयोगी सामान हर जोड़ी को सरकार दे |
9. मोदी सरकार की योजना
है जिसमे साल भर का बीमा १२ रूपये में हो जाता है | यदि सरकार हर गरीब लड़की का ५००
का बीमा करवा दे तो उसका हर साल का ब्याज १२ से अधिक आता रहेगा तथा जिंदगी भर के
लिए बच्ची का बीमा हो जाएगा | इसके लिए समाज से ५०० रूपये एक बच्ची के जीवन के
लिए लिया जा सकता हे | हर अमीर परिवार
ख़ुशी से यह काम करने तयार हो जाएगा क्योंकि दुर्गा माँ की झाँकियो में हर साल १०००
तक लोग देते हे | एक बार देवी स्वरुप लड़की की मदद कर देंगे |
10. महिलाओं में रोजगार
बढाने के लिए स्किल development जैसी सरकारी योजनाओ को जमीन पर लाना होगा तथा हर
गाँव में कुछ खास चीजो के प्रशिक्षण केंद्र लगें तथा वहाँ वह सामान महिलाओं को
बनाना सिखाया जाए जिसे वो बेचकर कुछ कमा सकें | सरकार कुछ ऐसी वस्तुएं भी बनवा
सकती हैं जो सरकार खुद खरीद ले फिर या तो एक्सपोर्ट कर दे या प्रदेश में ही काम
में ले ले |
11. महिला सुरक्षा के
लिए हर जिले तथा गाँव में पुलिस थाने में
एक आपातकालीन नम्बर allot किया जाये जो २४ घंटे चालू रहे तथा उसे अटेंड
करने महिला पुलिसकर्मी रहे | तथा इसे दो तीन फ़ोन हो ताकि एक ना लगे तो दूसरा लग
सके | इस पर कॉल आते ही तुरंत एक्शन लिया जाए तथा महिला की सुरक्षा के लिए पुलिस
भेजी जाए |
12. जिन महिलाओं को
बच्चा होने वाला हो उनके लिए एक जननी एक्सप्रेस चलायी जाए जिसपर कॉल करते ही तुरंत
वह वहाँ पहुच जाए तथा उसमे स्टाफ एवं सभी सुविधाएँ उपलब्ध हों |
13. ऐसे डोक्टर जो भ्रूण
हत्या करते हे उनके डाक्टरी के लाइसेंस तुरंत कैंसिल कर देना चाहिए तथा जेल भेजना
चाहिए |
14. महिलाओं को ब्लू कॉलर
की नौकरियों की ट्रेनिंग देना जिसमे उन्हें गार्ड या बस कन्डक्टर या कंप्यूटर
ओपेरटर , टाइपिंग , मेकानिक आदि की भी ट्रेनिंग दी जाए ताकि उनके लिए यह रास्ते भी
खुले |
15. बच्चियों को स्कुल
और कोलेज में आत्मरक्षा के गुर सिखाएं जाएँ जिसके लिए हफ्ते में दो या तीन दिन
कराटे या मार्शल आर्ट सिखाया जाएँ |
16. स्कुल , कॉलेज तथा
ग्रामीण स्तर पर सेमिनार और नुक्कड़ नाटक तथा डाक्यूमेंट्री फिल्म के माध्यम से
महिलाओं के कानूनी अधिकारों के विषय में महिला तथा पुरुषों दोनों को बताया जाय तथा
किस कानून में क्या है और किस जुर्म की कहाँ रिपोर्ट करनी है तथा क्या सजा है यह
भी बताया जाए | इसकी पुस्तके होअर्डिंग तथा अख़बार में भी विज्ञापन दिए जाएँ | ताकि
जुर्म करने वालो के मन में दहशत पैदा हो तथा बेटियों में आत्मविश्वास बढे |
17. हर गाँव में एक
लाइब्रेरी हो जिसमे शिक्षाप्रद कहानियां तथा महान पुरुषों तथा महिलाओं की जीवन
गाथा लिखी हो तथा यहाँ लड़कियों के बैठने के लिए अलग से व्यवस्था हो और यह
लाइब्रेरी मुफ्त हो |
18. हर गाँव और जिले में
एक खेल का मैदान हो जहाँ लड़कियों के लिए अलग से महिला कोच तथा जगह हो |
कार्यान्वित करने का
तरीका :-
इसके इम्प्लीमेंटेशन के लिए सरकार १० लोगो
की एक स्टेट टीम बनाये जिसमे महिला पुरुष, बुजुर्ग जवान दलित सवर्ण , शिक्षित
अशिक्षित सभी आ जाएँ | अब यह सब ध्यान पूर्वक ऐसी ही निष्पक्ष समितियां १० लोगों
की हर जिले में बनायें और वह समिति इसी
तरह से हर गाँव में १० लोगों की समिति बनाये | इन सबको सैलरी दी जाए तथा एक
निश्चित समय अवधि जैसे ६ महीने या ३ महीने जिनमे इन सबको अपनी जगह की महिलाओं की
समस्याओं के विषय में सर्वे करके रिसर्च करके या उनसे बात करके लिख कर बताना है |
गाँव वाले जिले को देंगे तथा जिले की रिपोर्ट स्टेट समिति के पास आएगी अब उसके
हिसाब से और योजनायें बढ़ाना या घटाना किया जाना चाहिए तथा सभी समस्याओं में कौन
कौन से मंत्रालयों की आवश्यकता पड़ेगी उन सबको एक जगह बैठाकर मुख्यमंत्री की आज्ञा
से क्लीयरेंस ले लेना चाहिए ताकि बाद में चक्कर ना लगाने पड़ें | तथा बाद में इसे
एक चार्टेड अकाउंटेंट के पास ले जाकर इन सबमे कितना खर्चा आएगा तथा कितना CSR या
समाज से लिया जा सकता है इसकी रिपोर्ट बना लेनी चाहिए |
अब यही १० १० लोगो की समितियां जो हमसे
सैलरी ले रही हैं इन्ही को यह योजनाओं को कार्यान्वित करने का काम सौपा जाना चाहिए
तथा अच्छा काम करने पर सब समितियों के सामने बुलाकर सम्मानित करना चाहिए |
यही समितियां संस्कार शाला भी देखेंगी तथा
यही लोग सरकार की योजनाओं को भी वहाँ लागू करवाएंगे तथा हर महीने कितना कार्य हुआ
इसकी रिपोर्ट जिले को तथा जिले राज्य समिति को भेजेंगे और राज्य समिति इसका
प्रेजेंटेशन मुख्यमंत्री को दिखाएगी |
मेरे अनुसार इस तरह ना सिर्फ महिलाओं की
स्थिति में बल्कि पुरे गाँव तथा समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है |
प्रस्तुतकर्ता
शुभम वर्मा
09713760660
theshubhamhindi@gmail.com

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